Saturday, November 22, 2008

भारतीय पैनोरमा - गुलमोहर

मलयालम - 100 मिनट - 35 मि.मी. - रंगीन
निर्माता ------------ जयराज
निर्देशक और पटकथा --- दीदी दामोदरन
छायांकन ----------- एम.जे. राधाकृष्णन
संपादन ------------ विजय संकर
संगीत ------------- जॉनसन
पात्र --------------- रणजीत, मीनू, मैथ्यू, सिद्दीकी


आप पद्दलित होने के खिलाफ नृशंसता से लड़ने से भला कितनी दूर भागेंगे? आप अपने कामरेडों के उत्साह को किस हद तक पुनर्जीवित कर पाएंगे।
गुलमोहर ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो बहुत दूर, अपनी राह से भी बहूत दूर उस विचारधारा में रहने गया जिसमें वह विश्वास करता है। वह असफल हो गया, इसलिए उसका विजन भी नाकाम हो गया, मगर उसने अपनी लड्ने की क्षमता कभी नहीं खोई। सच्चा योध्दा उनके लिए लड़ता है जो हर बार गिरकर फिर खड़े जो जाते हैं।

इंदुचूदान का सफर उसकी युवावस्था के जोश में पढ़ाई के दिनों से शुरू होता है और भव्य खामोशी मगर प्रतिरोध के साथ बुढ़ाने तक जारी रहता है। वर्तमान से लेकर उस गड़बड़ी तक तथा देश में आपातकाल के बाद चिंता के उस दौरे तक हम यही देखते हैं।
इंदुचूदान लेखक, योध्दा और प्रेमी है, वह ऐसे पुनरूत्थान का सपना देखता है जो कभी नहीं आया। वह अपनी प्रेमिका का भी ख्वाब देखता है, जिसे वह गुलमोहर के फूलों के बीच पीछे छोड़ आया है। दुर्भाग्य से वह भी कभी नहीं आती।

इनमें से कोई भी उसे पराजित नहीं कर पाएगा, यहां तक कि पुलिस भी पूछताछ के दौरान शारीरिक प्रहार भी उसे पराजित नहीं कर पाता। परंतु वह उस वक्त बिखर जाता है जब उसके कामरेड किसी कारण अपना जीवन बलिदान कर देते हैं। वह जेल के बाद वापस लौटकर एकान्तवास में चला जाता है और एक आदर्शवादी स्कूल टीचर के रूप में कहानी में लौटता है।

क्रांतिकारियों के ख्वाबों की तरह उसे भी अपने सपनों के लिए कट्टर जुनून है। इंदुचूदान अपने कामरेड के लिए, उस जनता के लिए जिसकी जमीन छीन ली गई और जो ना उम्मीद है गुलमोहर की तरह मोर्चाबंदी करता है। यह जंग जीतने के लिए, उसे अपने पूर्णतया समर्पित करना होगा।
इस शाश्वत दुविधा के समक्ष, क्या वह हार मान जाएगा या जोश से उठ खड़ा होगा?

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